बकरी एक उपयोगी पालतू पशु है, जिसे मुख्य रूप से दूध उत्पादन और प्राकृतिक खाद (गोबर) के लिए पाला जाता है। बकरी का गोबर कृषि भूमि की उर्वरता बढ़ाने में सहायक होता है और जैविक खेती में इसका विशेष महत्व है। यही कारण है कि ग्रामीण भारत में बकरी को कम लागत में अधिक लाभ देने वाला पशु माना जाता है।
विश्व के अनेक देशों में बकरियाँ पालतू तथा जंगली रूप में पाई जाती हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार आज की घरेलू बकरियाँ प्राचीन काल में पश्चिमी एशिया और यूरोप के कुछ भागों में पाई जाने वाली जंगली बकरियों से विकसित हुई हैं। समय के साथ-साथ मानव ने अपनी आवश्यकता और भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार बकरियों की विभिन्न नस्लों का विकास किया। वर्तमान समय में विश्व भर में सैकड़ों नस्लें पाई जाती हैं, जबकि भारत में लगभग 20 प्रमुख नस्लें उपलब्ध हैं।
आनुवंशिक विशेषताएँ
बकरी एक द्विगुणित पशु है, जिसमें कुल 60 गुणसूत्र होते हैं। इसकी आनुवंशिक संरचना इसे विभिन्न जलवायु परिस्थितियों में जीवित रहने और अनुकूलन करने में सक्षम बनाती है।
व्यवहार एवं स्वभाव
बकरियाँ स्वभाव से जिज्ञासु, सक्रिय और फुर्तीली होती हैं। वे ऊँचे-नीचे स्थानों पर आसानी से चढ़ सकती हैं और संतुलन बनाए रखने में दक्ष होती हैं। यही कारण है कि बकरियाँ पहाड़ी और पथरीले क्षेत्रों में भी सफलतापूर्वक पाली जा सकती हैं।
चरते समय बकरियाँ पूरे क्षेत्र में फैल जाती हैं, जिससे उपलब्ध चारे का बेहतर उपयोग हो पाता है। खतरे की स्थिति में बकरी सतर्क होकर सामने से प्रतिक्रिया देती है। कई शोधों में यह भी पाया गया है कि बकरियों में सीखने और परिस्थितियों को समझने की अच्छी क्षमता होती है।
बकरी पालन का आर्थिक एवं सामाजिक महत्व
बकरी पालन का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसे महिलाएँ, वृद्ध तथा बच्चे भी आसानी से कर सकते हैं। कम पूंजी में शुरू होने वाला यह व्यवसाय ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार का महत्वपूर्ण साधन बन चुका है। वर्तमान समय में देश के विभिन्न राज्यों में वैज्ञानिक पद्धति से बकरी पालन किया जा रहा है और अनेक सफल बकरी फार्म स्थापित हो चुके हैं।
भूमिहीन मजदूरों, छोटे एवं सीमांत किसानों के लिए बकरी पालन नियमित आय का साधन है। बकरियाँ कम गुणवत्ता वाले चारे और झाड़ियों पर भी जीवित रह सकती हैं, जिससे इनके पालन की लागत कम रहती है।
बकरी को “चलती-फिरती डेयरी” कहा जाता है क्योंकि इससे आवश्यकता के अनुसार ताजा दूध प्राप्त किया जा सकता है। इसके साथ ही बकरी का गोबर प्राकृतिक खाद के रूप में खेतों, सब्ज़ी उत्पादन और बागवानी में उपयोग किया जाता है, जिससे मिट्टी की संरचना और जल धारण क्षमता में सुधार होता है।
भारतीय कृषि में बकरी की भूमिका
भारत की कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में बकरी का विशेष स्थान है। सीमित संसाधनों के बावजूद बकरी पालन से किसानों को निरंतर लाभ मिलता है। पिछले कुछ दशकों में बकरियों की संख्या में हुई वृद्धि यह सिद्ध करती है कि यह पशु ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत उपयोगी है।
बकरी पालन के विकास में सहायक प्रमुख कारण हैं—
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विभिन्न जलवायु क्षेत्रों में अनुकूलन की क्षमता
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एक बार में एक से अधिक बच्चों को जन्म देने की योग्यता
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व्याने के बाद शीघ्र पुनः जनन की क्षमता
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दूध उत्पादन और जैविक खाद की निरंतर उपलब्धता
भारत की प्रमुख बकरी नस्लें
भारत में पाई जाने वाली प्रमुख बकरी नस्लों में जमुनापरी, बरबरी, सिरोही, बीटल, ब्लैक बंगाल, ओस्मानाबादी, कश्मीरी, चम्बा और गद्दी शामिल हैं।
जमुनापरी बकरी : संक्षिप्त परिचय
उत्पत्ति स्थल
जमुनापरी बकरी की उत्पत्ति उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में मानी जाती है। यह नस्ल यमुना और चम्बल नदियों के आसपास के क्षेत्रों में अधिक पाई जाती है।
शारीरिक विशेषताएँ
यह बकरी आकार में बड़ी होती है। इसके कान लंबे और नीचे की ओर लटके होते हैं। शरीर का रंग सामान्यतः सफेद होता है, जिस पर कभी-कभी भूरे या काले धब्बे भी पाए जाते हैं। वयस्क बकरी का औसत वजन लगभग 60 किलोग्राम तथा बकरे का वजन 90 किलोग्राम तक हो सकता है।
उपयोगिता
जमुनापरी बकरी दूध उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। यह नस्ल ग्रामीण एवं कठिन परिस्थितियों में भी आसानी से पाली जा सकती है। एक दुग्धकाल में यह बकरी अच्छी मात्रा में दूध देती है, जिसमें वसा की मात्रा संतोषजनक होती है। साथ ही इससे प्राप्त गोबर जैविक खाद के रूप में अत्यंत उपयोगी है।
संस्कृति में बकरी
भारतीय लोक-संस्कृति और भाषाओं में बकरी का उल्लेख अनेक रूपों में मिलता है। कई स्थानों पर बकरी को सरल और सीधा स्वभाव रखने वाला पशु माना गया है। बोलचाल की भाषा में इससे जुड़े शब्द सामाजिक व्यवहार और मानवीय प्रवृत्तियों को दर्शाने के लिए भी प्रयोग किए जाते हैं।
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